विशेष संवाददाता | खगड़िया
देश की आज़ादी की लड़ाई में कई नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी सेनानी रहे जिनकी देशभक्ति केवल संघर्ष तक सीमित नहीं रही, बल्कि सिद्धांतों की मिसाल बन गई। खगड़िया ज़िले के संसारपुर गांव के वीर सपूत ब्रह्मदेव चौधरी उन्हीं महान हस्तियों में से एक थे, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत से लोहा लेने के साथ-साथ आज़ादी के बाद सरकारी पेंशन तक ठुकरा दी।उनका मानना था कि “देश के लिए लड़ना कोई एहसान नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है।”बचपन से ही विद्रोही तेवरसाल 1900 में जन्मे ब्रह्मदेव चौधरी के भीतर कम उम्र से ही अंग्रेज़ी शासन के प्रति आक्रोश था। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय रहे। बताया जाता है कि वे अंग्रेज़ों की संपत्तियों पर धावा बोलकर आंदोलनकारियों के लिए धन और हथियार जुटाते थे।एक बार अंग्रेज़ प्रशासन ने उनके घर से 47 बंदूकें बरामद की थीं, जिसने उनकी क्रांतिकारी ताकत का अंदाज़ा दे दिया।गद्दारों पर भी सख़्त रुखउनका संघर्ष सिर्फ अंग्रेज़ों तक सीमित नहीं था। जो लोग ब्रिटिश शासन की मदद करते थे, उनके खिलाफ भी वे सख्ती बरतते थे। स्थानीय कथाओं में आज भी चर्चित है कि देशद्रोहियों को कड़ी चेतावनी दी जाती थी, ताकि पूरे इलाके में देशभक्ति का संदेश जाए।माता-पिता की गिरफ्तारी, फिर आत्मसमर्पणअंग्रेज़ों ने उन्हें झुकाने के लिए उनके माता-पिता को जेल में डाल दिया और घर में तोड़फोड़ की।परिवार पर हो रहे अत्याचार की खबर मिलते ही वे खुद पुलिस के सामने हाज़िर हो गए और माता-पिता की रिहाई की शर्त रखी।इसके बाद उन्हें 11 दिनों तक अमानवीय यातनाएँ दी गईं, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा।आजीवन कारावास और जेल की यातना1942 के आंदोलन के दौरान उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। उन्हेंभागलपुर सेंट्रल जेलबक्सर सेंट्रल जेलहजारीबाग सेंट्रल जेलमुजफ्फरपुर सेंट्रल जेलमें रखा गया।कड़ी सुरक्षा के बीच हर रविवार उन्हें गांव लाया जाता था। इसी दौरान बिहार आगमन पर महात्मा गांधी स्वयं उनके घर पहुंचे और परिवार से मुलाकात कर हालात की जानकारी ली थी।आज़ादी के बाद पेंशन से इनकारदेश स्वतंत्र होने के बाद सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन देने की पेशकश की, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया।उनका कहना था —“मातृभूमि के लिए किया गया संघर्ष किसी पेंशन या पुरस्कार का मोहताज नहीं होता।”यह फैसला आज भी उन्हें अलग पहचान देता है।प्रेरणादायी विरासत22 मई 2002 को 102 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।आज भी खगड़िया और आसपास के इलाकों में उन्हें त्याग, साहस और सच्ची देशभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।निष्कर्षब्रह्मदेव चौधरी का जीवन हमें सिखाता है कि आज़ादी सिर्फ़ विदेशी हुकूमत से नहीं, बल्कि अन्याय, डर और गद्दारी के खिलाफ डटकर खड़े होने से मिलती है।ऐसे गुमनाम नायकों की कहानियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं।